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विश्व लिवर दिवस पर “जीवन का उत्सव”, अंगदान जागरूकता के लिए मरीज और डोनर एक मंच पर
लिवर से गुफ्तगू एक कप कॉफी के साथ” थीम पर हुआ आयोजन
देश में 50 हजार मरीजों को हर साल जरूरत पर जागरूकता के अभाव में होते हैं सिर्फ 5 हजार ट्रांसप्लांट
इंदौर। विश्व लिवर दिवस के अवसर पर “जीवन का उत्सव” कार्यक्रम आयोजित किया गया। “लिवर से गुफ्तगू एक कप कॉफी के साथ” थीम पर आधारित इस कार्यक्रम में लिवर ट्रांसप्लांट प्राप्तकर्ताओं और निस्वार्थ भाव से अंगदान करने वाले दाताओं को एक मंच पर लाया गया, जहां उन्होंने अपने अनुभव साझा किए।
गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट व लीवर ट्रांस्प्लांट विशेषज्ञ डॉ. अजय के जैन ने कहा कि लिवर से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन समय पर जांच, सही उपचार और जागरूकता से इन्हें काफी हद तक रोका जा सकता है। उन्होंने बताया कि लिवर ट्रांसप्लांट उन मरीजों के लिए अंतिम और प्रभावी विकल्प होता है, जिनका लिवर पूरी तरह से खराब हो चुका होता है। ऐसे में अंगदान ही एकमात्र उम्मीद बनता है। उन्होंने कहा कि समाज में अभी भी अंगदान को लेकर कई तरह की भ्रांतियां और डर मौजूद हैं, जिन्हें दूर करना जरूरी है। इस तरह के कार्यक्रमों का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि उन लोगों को सामने लाना भी है जिन्होंने ट्रांसप्लांट के बाद सामान्य जीवन जीकर एक सकारात्मक उदाहरण पेश किया है। डॉ. सुधांशु यादव ने कहा जब लोग सीधे मरीजों और डोनर परिवारों से उनकी कहानी सुनते हैं, तो उनके मन में भरोसा बढ़ता है और अंगदान के प्रति सोच बदलती है। उन्होंने कहा कि यदि कैडेवर डोनेशन बढ़े, तो हजारों मरीजों को नई जिंदगी मिल सकती है।
पांच साल का बच्चा भी हुआ शामिल
आयोजन में लिवर डोनर और ट्रांसप्लांट प्राप्तकर्ता शामिल हुए, जिनमें एक 5 साल का बच्चा भी था, जिसे उसकी मां ने लिवर दान किया था। डॉ. शोहिनी सिरकार और डॉ. सुचिता जैन ने बताया कि भारत में हर साल लगभग 50 हजार मरीजों को लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है, लेकिन केवल 5 हजार ट्रांसप्लांट ही हो पाते हैं। काउंसलर देबी चटर्जी ने बताया कि कैडेवर डोनेशन बहुत कम है और ज्यादातर ट्रांसप्लांट लिविंग डोनर यानी परिवार के सदस्यों से होते हैं। जागरूकता की कमी, अंधविश्वास, सरकारी अस्पतालों में सीमित सुविधाएं और भरी खर्च इसके प्रमुख कारण हैं।
एक्सरसाइज को दिनचर्या मे करें शामिल
एडवोकेट मस्तान सिंह छाबड़ा (62) ने बताया कि वर्ष 2020 में उन्हें खून की उल्टी हुई, जिसके बाद जांच में पता चला कि उनके लिवर में कैंसर है और उन्हें लिवर ट्रांसप्लांट करवाना पड़ेगा। आरएफए प्रक्रिया के जरिए कैंसर को बर्न किया गया और इसके बाद उन्होंने कैडेवर ट्रांसप्लांट के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया। उन्होंने बताया कि महज तीन दिन के भीतर ही वर्ष 2021 में उनका नंबर आ गया और सर्जरी संभव हो सकी। ट्रांसप्लांट के बाद एक साल तक उन्होंने पूरी तरह से परहेज रखा और डॉक्टरों की सलाह का सख्ती से पालन किया। अब वे सामान्य जीवन जी रहे हैं। उन्होंने आम लोगों से अपील की कि जीवन को बेहतर तरीके से जिएं, हेल्दी भोजन लें और नियमित एक्सरसाइज को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं, ताकि गंभीर बीमारियों से बचा जा सके।
अंधविश्वास के कारण नहीं मिलता लिवर
सुनील मेहरा (42) ने बताया कि उन्हें लिवर सिरोसिस था और डॉक्टरों ने ट्रांसप्लांट की सलाह दी। उन्होंने दिल्ली और इंदौर में कैडेवर ट्रांसप्लांट के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया। करीब दो साल इंतजार के बाद जब उनका नंबर आया, तब डोनर परिवार की ओर से असमंजस की स्थिति बनी रही। डोनर परिवार में अंधविश्वास के कारण सहमति नहीं बन पा रही थी। परिवार के कुछ सदस्यों का मानना था कि अंगदान करने से मृत व्यक्ति की आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी। इस कारण उन्हें समय पर लिवर नहीं मिल पाया। बाद में काउंसलिंग के जरिए परिवार को समझाया गया, जिसके बाद उन्होंने सहमति दी। रात में ही ग्रीन कॉरिडोर बनाकर लीवर ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया पूरी की गई और करीब आठ साल पहले उनका सफल ट्रांसप्लांट हुआ। उन्होंने लोगों से अपील की कि अंगदान के लिए आगे आएं, क्योंकि कैडेवर डोनेशन से किसी दूसरे व्यक्ति को नया जीवन मिल सकता है और किसी का प्रियजन दूसरे के भीतर जीवित रह सकता है।
लिवर डोनेशन से जुड़ी भ्रांतियां :
- लिवर दान करने से धर्म के खिलाफ होता है।
- डॉक्टर डोनर को बचाने की पूरी कोशिश नहीं करेंगे।
- एक ही व्यक्ति का लिवर सिर्फ एक को ही दिया जा सकता है।
- गरीब या सामान्य लोगों को अंग नहीं मिलते।
- उम्र ज्यादा होने पर अंगदान नहीं हो सकता।
- कैडेवर डोनेशन बहुत कम सफल होता है। लिवर डोनेशन से बचाई जा सकती हैं कई जिंदगियां :
- लिवर शरीर का एकमात्र ऐसा अंग है जो खुद को पुनः विकसित (regenerate) करने की क्षमता रखता है।
- एक स्वस्थ व्यक्ति अपने लिवर का लगभग 50% से 70% हिस्सा सुरक्षित रूप से दान कर सकता है।
-लिवर दान दो प्रकार से किया जाता है, जीवित दाता (Living Donor) और मृत दाता (Deceased Donor)
-दान के बाद डोनर और रेसिपिएंट दोनों में लिवर कुछ ही हफ्तों में सामान्य आकार तक विकसित हो जाता है।
-18 से 55 वर्ष तक का स्वस्थ व्यक्ति, जिसका ब्लड ग्रुप मैच करता हो, लिवर दान कर सकता है।


